Tuesday, 15 April 2008

कितने शहरों में कितनी बार


फिराक साहब की विनोदप्रियता और मुंहफटपन के कई किस्से अनिता और शशि को जुबानी याद थे. दोनों उनसे मिलने जाती रहती थीं. अनिता ने ही बताया कि एक बार फिराक साहब के घर में चोर घुस आया. फिराक साब और अनिता दोनों बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकानों में रहते थे. ऐसा लगता था उन मकानों की बनावट चोरों की सहूलियत के लिए ही हुयी थी, वहां आएदिन चोरियाँ होतीं. फिराक साब को रात में ठीक से नींद नहीं आती थी. आहट से वे जाग गये. चोर इस जगार के लिए तैयार नहीं था. उसने अपने साफे में से चाकू निकाल कर फिराक के आगे घुमाया. फिराक बोले, "तुम चोरी करने आये हो या कत्ल करने. पहले मेरी बात सुन लो."
चोर ने कहा, "फालतू बात नहीं, माल कहाँ रखा है?"
फिराक बोले, "पहले चक्कू तो हटाओ, तभी तो बताऊंगा."
फ़िर उन्होंने अपने नौकर पन्ना को आवाज़ दी, "अरे भई पन्ना उठो, देखो मेहमान आये हैं, चाय वाय बनाओ."
पन्ना नींद में बड़बडाता हुआ उठा, "ये न सोते हैं न सोने देते हैं."
चोर अब तक काफी शर्मिंदा हो चुका था. घर में एक की जगह दो आदमियों को देखकर उसका हौसला भी पस्त हो गया. वह जाने को हुआ तो फिराक ने कहा, " दिन निकाल जाए तब जाना, आधी रात में कहाँ हलकान होगे." चोर को चाय पिलाई गई. फिराक जायज़ा लेने लगे कि इस काम में कितनी कमाई हो जाती है, बाल बच्चों का गुज़ारा होता है कि नहीं. पुलिस कितना हिस्सा लेती है और अब तक कै बार पकड़े गये.
चोर आया था पिछवाड़े से लेकिन फिराक साहब ने उसे सामने के दरवाजे से रवाना किया यह कहते हुए, "अब जान पहचान हो गई है भई आते जाते रहा करो."

-ममता कालिया. "कितने शहरों में कितनी बार" अन्तिम किश्त से. तद्भव17. जनवरी 2008.

2 comments:

अतुल said...

बहुत रोचक प्रसंग. कुछ तो मैं भी जानता हूं फ़िराक साहब के बारे में.

miHir pandya said...

सब ममता जी की मेहरबानी!

दोस्त तो आप भी कह डालिए इसी बहाने. फ़िराक की जिन्दादिली के जितने किस्से यहाँ हों उतने कम हैं.